मन में उठते भाव शब्दों की सीढ़ी चढ़ते कभी अर्थ न निकलता पर कभी सुंदर विचार आते विचारों की श्रृंखला जब बनती सार दार अभिव्यक्ति जन्म लेती जितनी बार आंखों से गुजरती गंभीर रचना जन्म लेती ऐसे ही लेखन का प्रारंभ होता कितनी सीढ़ी चढ़ पाते यह तो याद नहीं पर अर्थ आते ही लिखना बंद करते पढ़ने योग्य वाक्य का समूह होता अब नाम। आशा लता सक्सेना
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आशा कैसी किससे करे कोई तो अपना हो कब तक आश्रित रहूगी यह तक मालूम नहीं । किताब भी मौन है कुछ बोलती नहीं न जाने कैसे नाराज हुई है यह भी मालूम नहीं। किताब भी मौन है कुछ बोलती नहीं न जाने कैसे नाराज हुई है यह भी मालूम नहीं है । यह कैसा अन्याय है मेरे साथ ही है ऐसा किस लिये यह तक समझ न पाई तुमसे दूरी किस लिये । आशा
आज मुझे यह कहने दो
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आज मुझे यह कहने दो कि मेरा सोच गलत नहीं था नया परिवेश नया मकान निभाना इतना सहज नहीं था फिर भी मैंने तालमेल किया है अब कोई समस्या नहीं है । खाली घर और हम अकेले करते तो क्या करते आने को हुए बाध्य कैसे अकेले रह पाते वहाँ । स्वास्थय ने भी किनारा किया वह भी साथ न दे पाया आखिर वक्त से सम्झौता किय यहाँ आने का मन बनाया । आशा