संदेश

 मन में उठते भाव शब्दों की सीढ़ी चढ़ते कभी अर्थ न निकलता पर कभी सुंदर विचार आते विचारों की श्रृंखला जब बनती सार दार अभिव्यक्ति जन्म लेती जितनी बार आंखों से गुजरती गंभीर रचना जन्म लेती ऐसे ही लेखन का प्रारंभ होता कितनी सीढ़ी चढ़ पाते यह तो याद नहीं पर अर्थ आते ही लिखना बंद करते पढ़ने योग्य वाक्य का समूह होता अब नाम। आशा लता सक्सेना

Akanksha -asha.blog spot.com: शुभ कामनाएं

Akanksha -asha.blog spot.com: शुभ कामनाएं : दुनिया मेधालय पर अपने संस्मरण लिखे हैं | वे अब पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किये हैं |वर्णन इतना सुन्दर किया है कि यदि पढो तो पढ़ते ही रह जाओ ...

Akanksha -asha.blog spot.com: वीणा का तार

Akanksha -asha.blog spot.com: वीणा का तार :    जब वीणा का तार  बजा स्वर र्में बजा किसी को बाध्य ना होना पड़ा यही सब सीखने के लिए | मन में रहा उत्साह   नया सीखने के लिए जब कोशि...i

Akanksha -asha.blog spot.com: आत्म विश्वास

Akanksha -asha.blog spot.com: आत्म विश्वास :  एक वह  दिन था जब  हमें  जानता न था कोई  किसी कार्य को करने के लिए  बाहर वालों का मुंह देखना पड़ता था | बहुत कठिनाई हुई इस समाज में  खुद को स...

Akanksha -asha.blog spot.com: आखिर कब तक

Akanksha -asha.blog spot.com: आखिर कब तक :        आ खिर कब त क  तुम्हारे पीछे चक्कर लगाता  अपने मन की एक ना सुनता   तुम से बहुत आशा रखी थी यहीं भूल हुई मुझसे|   यदि किसी बड़े क...

Akanksha -asha.blog spot.com: कठिन मार्ग दौनों का

Akanksha -asha.blog spot.com: कठिन मार्ग दौनों का :                                          हो गुलाब का फूल  या हो पुष्प कमल का  उन तक जाने में     पहुँच मार्ग में   बड़े व्यवधान आते हैं |...

अनोखा एहसास

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                                                    हुआ अनोखा एहसास मुझे                                                        यह कैसे हुआ क्या हुआ                                                             मैं जानती कैसे              ...

जा कर भूला

  लाने गया बाजार मे बरफी जा कर भूला क्या करना है लो आ गया फिर से जहाँ से चला था पर याद ना आई अब भी बरफी    की । अशा

पुस्तक

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                    आशा कैसी किससे करे कोई तो अपना हो कब तक आश्रित रहूगी   यह तक मालूम नहीं । किताब भी मौन है कुछ बोलती नहीं न जाने कैसे नाराज हुई है यह भी मालूम नहीं। किताब भी मौन है कुछ बोलती नहीं न जाने कैसे नाराज हुई है यह भी मालूम नहीं है । यह   कैसा अन्याय है मेरे साथ ही है ऐसा किस लिये यह   तक समझ न पाई तुमसे दूरी किस लिये । आशा  

आज मुझे यह कहने दो

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    आज मुझे यह कहने दो कि मेरा सोच गलत नहीं था नया परिवेश नया मकान निभाना इतना सहज नहीं था   फिर भी मैंने तालमेल   किया है अब कोई समस्या   नहीं है । खाली घर और हम अकेले करते तो   क्या करते आने को हुए बाध्य कैसे अकेले रह पाते वहाँ ।   स्वास्थय ने भी किनारा किया वह भी साथ न दे पाया आखिर वक्त से सम्झौता किय                                                                                       यहाँ आने का मन बनाया । आशा